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Tuesday, October 27, 2020
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क्या ऐसे होगा “सबका साथ सबका विकास” रुद्रप्रयाग के जखोली ब्लाक में उच्च शिक्षा व्यवस्था का बंटाधार

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ऐसा कहते हैं, और है भी की क्षेत्र का विकास मुखिया के हाथ में होता है. भारत में मुखिया लोकतान्त्रिक तरीके से चुना जाता है पांच साल के लिए. और इसी लोकतान्त्रिक प्रणाली से क्षेत्र, राज्य, देश में चुनी हुई सरकार पांच साल तक ‘मुखिया’ का किरदार निभाती हैं. अब मुखिया मतलब क्या. ये आप बेहतर जानते हैं. देश को या किसी भी क्षेत्र को विकास तक पहुंचाने के लिए लोगो को विकसित यानि शिक्षित करना पड़ता है. और उसके लिए आवश्यक है बुनियादी सुविधाएं. एक बार फिर कह रहे हैं सुविधाएं नहीं, ये तो बड़ी चीज हो गयी. हम सिर्फ बुनियादी सुविधाएं की बात कर रहे हैं जैसे लोग शहर या गाँव में सड़क, नाली, पानी को बुनियादी सुविधाओं का आधार मानते है न. तो बस वो ही वाली बुनियादी सुविधाएं की बात हम कर रहे हैं शिक्षा के सन्दर्भ में.

चिरबटिया कृषि महाविद्यालय

अब आप उच्च शिक्षा व्यवस्था का हाल बेहतर तरीके से समझ सके इसके लिए हम आपको लिए चलते हैं रुद्रप्रयाग और टिहरी जिले की सीमा पर स्थित जाखोली ब्लाक के अन्तर्गत चिरबटिया में स्थापित कृषि महाविद्यालय. महाविद्यालय का भवन निर्माण कार्य तीन वर्ष बाद भी पूरा नहीं हो सका है. शासन से महाविद्यालय के लिए 25 करोड़ के बजट की स्वीकृति तो मिली, लेकिन 5 करोड़ रूपए ही अवमुक्त हो पाया. हालांकि भवनों का तो निर्माण हो गया लेकिन अभी कई अन्य भवनों का निर्माण शेष है. भवन न बनने से चिरबटिया कृषि महाविद्यालय के तीस छात्रों की कक्षा रानीचौरी परिसर में संचालित हो रही हैं.

वर्ष 2014 में रुद्रप्रयाग व टिहरी जिले की सीमा पर चिरबटिया में कृषि महाविद्यालय की स्थापना की घोषणा की गई. चिरबटिया में वर्षो से खाली पड़ी उद्यान विभाग की लगभग 8.3 हेक्टेयर जमीन को कृषि महाविद्यालय भवन निर्माण के लिए चयनित किया गया. चयनित जमीन को कृषि महाविद्यालय के नाम आवंटित कर भवन निर्माण के लिए आंगणन तैयार कर शासन को भेजा गया. जिसके बाद तत्कालीन प्रदेश सरकार ने कृषि महाविद्यालय भवन निर्माण के लिए 25 करोड़ के बजट को मंजूरी मिली. इस बजट से पांच करोड़ रूपए अवमुक्त भी किए गए.

शासन ने टेंडर के माध्यम से उत्तर प्रदेश निर्माण निगम को निर्माण का जिम्मा दिया गया था. कार्यदायी संस्था ने यहां पर टाइप थ्री व टू के आवास का निर्माण किया और महाविद्यालय का मुख्य भवन भी बन कर तैयार हो गया है. आधे-अधूरे निर्माण के बाद यह पूरा भवन लावारिस हाल में पड़ा है. बजट की दूसरी किस्त न मिलने से कार्यदायी संस्था ने भवन निर्माण कार्य पिछले तीन वर्ष से बंद कर दिया है। उत्तराखंड सरकार बने लंबा समय बीत चुका है, लेकिन अभी तक भवन के लिए स्वीकृत शेष धनराशि को रिलीज नहीं किया गया है. महाविद्यालय प्रशासन भी लंबे समय से बजट अवमुक्त करने को लेकर शासन-प्रशासन से पत्राचार करता आ रहा है.

आधे-अधूरे भवन निर्माण के चलते वर्तमान में कक्षाओं का संचालन कृषि महाविद्यालय के रानीचौरी परिसर में संचालित हो रही हैं स्थानीय निवासी राम रतन सिंह पंवार का कहना है कि जब शासन की ओर से चिरबटिया में कृषि महाविद्यालय की स्वीकृति दे दी गई, तो अब भवन निर्माण कार्य भी समय से पूरा किया जाना आवश्यक है। जिससे स्थानीय लोगों को महाविद्यालय का बेहतर लाभ मिल सके.

अब चलते हैं जखोली पॉलिटेक्निक की ओर                       

हाल ही में उत्तराखंड सरकार ने प्रदेश में करीब बारह पॉलिटैक्निक संस्थानों को बंद करने का आदेश जारी कर दिया है. इनमें से एक संस्थान रुद्रप्रयाग जनपद का जखोली पॉलिटैक्निक संस्थान भी है. जबकि जखोली में करीब चार करोड़ 66 लाख रुपए की धनराशि से पॉलिटैक्निक संस्थान का निर्माण चल रहा है.

इससे पहले सरकार दस आई.टी.आई भी बंद करने का आदेश जारी कर चुकी है. अब सरकार ने पॉलिटैक्निकों के भवनों को उच्च शिक्षा निदेशालय को हस्तांतरित करने के आदेश भी जारी कर दिये हैं.  बताया गया कि उत्तराखंड सरकार का इरादा बंद हो चुके पॉलिटैक्निक के भवनों में डिग्री कॉलेज चलाने का है. हालांकि इन भवनों में डिग्री कॉलेज चल पाएंगे या नहीं, इस पर भी संशय है. जखोली में पॉलिटैक्निक संस्थान का भवन बनकर तैयार होने को है. इस भवन पर चार करोड़ 66 लाख रुपये की धनराशि खर्च हो रही है. लेकिन इस भवन पर अब पॉलिटैक्निक संस्थान संचालित नहीं होगा. इस पर अब महाविद्यालय संचालित करने की तैयारी है.
जखोली में पॉलिटैक्निक संस्थान के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च कर ढांचा तो खड़ा कर दिया गया है. लेकिन अब सरकार ने इसे बंद कर रही है. सस्ती लोकप्रियता के लिए इस तरह के संस्थान खोले जा रहे हैं, जिसका फायदा छात्रों को नहीं मिल रहा है. अगर सरकार सभी ट्रेडों में स्थायी शिक्षकों की तैनाती करती तो संस्थान बंद करने की नौबत नहीं आती.
सरकार द्वारा लिए गए इस फैसले से पॉलिटैक्निकों में पढ़ाने वाले करीब 250 संविदा शिक्षक बेरोजगारी की कगार पर पहुँच गए हैं. वहीं इन संस्थानों में सैकड़ों पद रिक्त हैं. सरकारी पॉलिटैक्निकों में व्याख्याताओं के सृजित 953 पदों में से 722 पद रिक्त हैं. प्रधानाचार्यों के 77 स्वीकृत पदों में से 62 पद रिक्त हैं। इन पदों पर शिक्षकों की तैनाती होती तो आज पॉलिटैक्निक संस्थानों को बंद करने की स्थिति पैदा नहीं होती.
उत्तराखंड सरकार की मंशा बंद हो चुके पॉलिटैक्निक के भवनों में डिग्री कॉलेज चलाने की है. हालांकि इन भवनों में डिग्री कॉलेज चल पाएंगे या नहीं, इस पर भी संशय बना है. जखोली में पॉलिटैक्निक संस्थान का भवन बनकर तैयार होने को है. इस पर चार करोड़ 66 लाख रुपये की धनराशि खर्च हो रही है. लेकिन अब इस पर पॉलिटैक्निक संस्थान संचालित नहीं होगा. यानी सरकार करोड़ों रुपये खर्च कर ढांचा तो खड़ा कर रही है, लेकिन आधारभूत सुविधाएं नहीं जुटा रही है. सिर्फ लोकप्रियता हासिल करने के लिए मंत्री-मुख्यमंत्री इस तरह के संस्थानों की घोषणा तो कर देते हैं, लेकिन व्यवस्थाएं न होने से छात्र इन संस्थानों से मुंह मोड़ देते हैं और आखिर में सरकार इन संस्थानों पर ताला लगा देती है.

 

अब चलते हैं राजकीय महाविद्यालय जखोली की ओर

क्षेत्र में एक डिग्री कॉलेज है जो की नाम मात्र का ही है जो घनसाली मयाली मोटर मार्ग से 1 किलोमीटर की दूरी पर है और आजतक पक्की सड़क नहीं बन पायी. शिक्षा की बात करें तो बच्चों के लिए सरकार ने पूर्व में भी कई बार जखोली महाविद्यालय के लिए घोषणाएं की, लेकिन यह पूरी नहीं हुईं. कहा कि लंबे समय से अंग्रेजी, राजनीतिक विज्ञान, अर्थशास्त्र प्रवक्ता के रिक्त चल रहे थे जो इसी वर्ष फरवरी में पूर्ण किये गए अब देखना यह होगा की ये प्रवक्ता कितने समय के लिए ठहरते है.अधिकांश छात्रों को यहां से पलायन के लिए मजबूर होना पड़ रहा है.

छात्रों ने स्नातकोत्तर स्तर पर राजनीति विज्ञान के अलावा अर्थशास्त्र, हिन्दी, अंग्रेजी, भूगोल, इतिहास, संस्कृत, समाजशास्त्र आदि विषयों की संस्थागत रूप में स्वीकृति देने, स्नातक स्तर पर कला व विज्ञान के सभी विषयों को स्वीकृति देने, खेल मैदान निर्माण, चारदीवारी निर्माण, महाविद्यालय आवाजाही हेतु सड़क मार्ग पर डामरीकरण व मरम्मत, महाविद्यालय प्रशासन के कार्यों में पारदर्शिता आदि मांगे उठाई.

पहाड़ में अधिकांश छात्र वर्ग विज्ञान, कॉमर्स, और कला लगभग सभी में बराबर ही रहते और यह विद्यालय क्षेत्र में एकलौता है जहाँ पर अभी सिर्फ कला वर्ग के छात्र ही अपनी शिक्षा तमाम सुविधाओं के अभाव में कर रहे है तथा बाकि वर्ग के छात्रों को शिक्षा के लिए पलायन करने पर मजबूर हो चुके है और कर भी चुके है ऐसे में जिसकी परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक न हो उच्च शिक्षा ग्रहण करने के लिए पलायन करने की तो वो कैसे उच्च शिक्षा ग्रहण करेगा उसके लिए तो यहाँ विद्यालय न होने के सामान है

अब आखिरी में सैनिक स्कूल थाती-दिग्धार(विकासखंड जखोली) :

वर्ष 2014 में स्वीकृत स्कूल के कैंपस निर्माण पर 11 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं। वर्ष 2016 अक्तूबर से जांच के नाम पर कार्य ठप पड़ा है। बीते वर्ष 18 जनवरी को सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत ने मौके का निरीक्षण करते हुए यथाशीघ्र पुन: कार्य शुरू कराने की बात की थी, लेकिन एक वर्ष बीत जाने के बाद भी पूर्ववत है। सैनिक स्कूल निर्माण संघर्ष समिति के अध्यक्ष कालीचरण रावत ने कहा कि छह वर्ष बीत जाने के बाद भी सैनिक स्कूल धरातल पर नहीं उतर पाया है। उन्होंने कहा कि इस मामले में सरकार ने उदासीन रवैया अपनाया हुआ है, जिससे लोग खुद को ठगा सा महसूस कर रहे हैं। जांच के नाम पर जिस तरह से सैनिक स्कूल ठप हुए चार वर्ष बीत गए हैं, उससे अब भ्रम की स्थिति पैदा हो गई है।

अब आप ही बताएं अगर ये सब विद्यालय – महाविद्याल सुविधाजनक तरीके से सिर्फ घोषणाओं में न रहकर धरातल पर उतरते तो शिक्षा के क्षेत्र में यहाँ के युवाओं के विकाश तो होता ही साथ ही पलायन जैसी समस्या की भी नौबत न आती और स्थानीय लोगो को रोजगार के अवसर भी मिलते

 

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