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Friday, April 23, 2021
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उत्तराखंड: लागू होगा राज्य में क्लीनिकल इस्टेब्लिशमेंट एक्ट ? या बनकर रहे जायगा एक पहेली ! क्या है डाक्टरों के विरोध का कारण, जानिए

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केंद्र सरकार ने 2010 में ही क्लीनिकल इस्टेब्लिशमेंट एक्ट बना दिया था और पांच साल बाद वर्ष 2015 में उत्तराखंड में लागू करने के आदेश हुए लेकिन डाक्टरों के विरोध के कारण कानून अब तक धरातला में नहीं उतर सका। 2018 में हाईकोर्ट के आदेश के बाद सरकारी अधिकारियों की नींद खुली। एक्ट लागू करने की कवायद शुरू हुई तो 15 सितंबर 2018 को निजी अस्पतालों से जुड़े डाॅक्टर अनिश्चितकालीन हड़ताल पर चले गए। आइएमए का तर्क था, इस एक्ट से इंस्पेक्टर राज कायम हो जाएगा। कुछ दिनों हड़ताल, धरना-प्रदर्शन चलता रहा फिर सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत के आश्वावसन के बाद मामला शांत हुआ।

क्या है डाक्टरों के विरोध का कारण

क्लीनिकल इस्टेब्लिशमेंट एक्ट के तहत इलाज को लेकर अस्पतालों की जवाबदेही तय की गई है। अस्पताल प्रबंधन को मरीजों से जुड़े मेडिकल रिकार्ड सुरक्षित रखने हैं। इमरजेंसी में पहुंचे मरीज को स्टेबल करेंगे, फिर रेफर करेंगे। निर्धारित कीमतों को सार्वजनिक करना होग। मनमाना शुल्क नहीं वसूल पाएंगे। इमरजेंसी में 24 घंटे एमबीबीएस डॉक्टर ही रहेंगे। नियमों का उल्लंघन करने पर अस्पताल प्रबंधन व डाॅक्टर कार्रवाई की जाएगी। आइएमए के वरिष्ठ पदाधिकारी डाॅ. जेएस खुराना कहते हैं, क्लीनिक इस्टेब्लिशमेंट एक्ट लागू होने पर शहरों के आधे से ज्यादा अस्पताल व क्लीनिक बंद हो जाएंगे। बड़े अस्पताल ही रह जाएंगे। इनमें भी इलाज महंगा हो जाएगा. काॅरपोरेट घराने ही अस्पताल चलाएंगे। राज्य में सीईए के कठोर नियमों का पालन संभव नहीं है। इससे केवल इंस्पेक्टर राज को बढ़ावा मिलेगा। भ्रष्टाचार बढ़ेगा।

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