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Wednesday, April 21, 2021
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उत्तराखंड की वेशभूषा और आभूषण यहां की जीवन शैली को दर्शाती है, आइये जाने इनके बारे में

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उत्तराखंड की लोक संस्कृति पूरे विश्व में विख़्यात है। उत्तराखंड की वेशभूषा जातीय समुदायों, गढ़वालियों और कुमाऊँनी की संस्कृति और जीवन शैली को दर्शाती है। हर समाज की तरह उत्तराखंड का पहनावा (वस्त्र विन्यास) भी यहां की प्राचीन परंपराओं, लोक विश्वास, लोक जीवन, रीति-रिवाज, जलवायु, भौगोलिक, सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति, व्यवसाय, शिक्षा व्यवस्था आदि को प्रतिबिंब करता है।

उत्तराखंड के पारंपरिक परिधान:

उत्तराखंड की वेशभूषा और आभूषण - Traditional Dress and Ornaments of Uttarakhandउत्तराखंड की वेशभूषा और आभूषण - Traditional Dress and Ornaments of Uttarakhand

पारंपरिक रूप से उत्तराखंड की महिलाएं घाघरा व आंगड़ी और पुरुष चूड़ीदार पैजामा व कुर्ता पहनते थे। समय के साथ इनका स्थान पेटीकोट, ब्लाउज व साड़ी ने ले लिया। जाड़ों (सर्दियों) में ऊनी कपड़ों का उपयोग होता है। विवाह आदि शुभ कार्यों के अवसर पर कई क्षेत्रों में आज भी शनील का घाघरा पहनने की रवायत है। गले में गलोबंद, चर्यो, जै माला, नाक में नथ, कानों में कर्णफूल, कुंडल पहनने की परंपरा है। सिर में शीशफूल, हाथों में सोने या चांदी के पौंजी व पैरों में बिछुवे, पायजेब, पौंटा पहने जाते हैं। घर-परिवार के समारोहों में ही आभूषण पहनने की परंपरा है। विवाहित स्त्री की पहचान गले में चरेऊ पहनने से होती है। विवाह इत्यादि शुभ अवसरों पर पिछौड़ा पहनने का रिवाज भी यहां आम है।

पारंपरिक परिधान:

कुमाऊं में पुरुष परिधान: धोती, पैजामा, सुराव, कोट, कुत्र्ता, भोटू, कमीज मिरजै, टांक (साफा) टोपी आदि।

कुमाऊं में स्त्री परिधान: घाघरा, लहंगा, आंगड़ी, खानू, चोली, धोती, पिछोड़ा आदि।

कुमाऊं में बच्चों के परिधान: झगुली, झगुल कोट, संतराथ आदि।

गढ़वाल में पुरुष परिधान: धोती, चूड़ीदार पैजामा, कुर्ता, मिरजई, सफेद टोपी, पगड़ी, बास्कट, गुलबंद आदि।

गढ़वाल में स्त्री परिधान: आंगड़ी, गाती, धोती, पिछौड़ा आदि।

गढ़वाल में बच्चों के परिधान: झगुली, घाघरा, कोट, चूड़ीदार पैजामा, संतराथ (संतराज) आदि।

पारंपरिक आभूषण 

सिर में: शीशफूल, मांगटीका, सुहाग बिंदी, बांदी (बंदी)।

कानों में: मुर्खली (मुंदड़ा), कर्णफूल, तुग्यल, बाली,  कुंडल, बुजनी (पुरुष कुंडल)।

नाक में: बुलाक, फुल्ली, नथ (नथुली)।

गले में: कंठी माला, तिलहरी, चंद्रहार, गुलोबंद, हंसुली (सूत), लाकेट, चर्यों।

हाथ में: पौंजी (पौंछी), कड़ा, अंगूठी, गोखले, धागुली।

कमर में: करधनी, तगड़ी, कमर ज्योड़ी।

पैरों में: झिंवरा, इमरती, पौंटा, पाजेब, अमीर तीतार, झांवर, बिछुवा।

उत्तराखंड की संस्कृति भी अपनी अलग पहचान रखती है. यहां के विविध पर्व, त्यौहार, मेले ,नृत्य-गीत एवं वस्त्राभूषण आदि स्थानीय लोक जीवन के साथ अभिन्न रुप से जुड़े हैं। पूर्व में काली नदी से लेकर पश्चिम में टोंस नदी तक फैले इस भू भाग के निवासियों द्वारा प्रयोग में लाये जाने वाले विविध परिधान व आभूषण अपनी बनावट व सुन्दरता से हर किसी का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लेते हैं। इन्ही विशिष्टताओं के कारण यहां के वस्त्राभूषणों को हिमालयी संस्कृति व साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। यहां के लोक साहित्य, लोकगाथा, लोक कथाओं व लोक गीतों में स्थानीय वस्त्रों व आभूषणों को बखूबी से वर्णित किया गया है। आज भी अनेक पर्व उत्सव व नृत्य गीतों में पारम्परिक परिधानों व आभूषणों को अत्यंत उत्साह व उल्लास के साथ पहनने का रिवाज यहां कायम है।

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