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Thursday, April 22, 2021
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उत्तराखंड में होने वाले प्रमुख मेले, जिनके बारे में आपको पता होना चाहिए

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गढ़वाल- कुमाऊँ की संस्कृति यहाँ के मेलों में समाहित है।उत्तराखंड में साल भर अलग-अलग उत्सव और मेले का आयोजन होता रहता है। रंगीले कुमाऊँ के मेलों में ही यहाँ का सांस्कृतिक स्वरुप निखरता है। धर्म, संस्कृति और कला के व्यापक सामंजस्य के कारण इस अंचल में मनाये जाने वाले उत्सवों का स्वरुप बेहद कलात्मक होता है। छोटे-बड़े सभी पर्वों, आयोजनों और मेलों पर शिल्प की किसी न किसी विद्या का दर्शन अवश्य होता है। कुमाऊँनी भाषा में मेलों को कौतिक कहा जाता है। कुछ मेले देवताओं के सम्मान में आयोजित होते हैं तो कुछ व्यापारिक दृष्टि से अपना महत्व रखते हुए भी धार्मिक पक्ष को पुष्ट अवश्य करते है। पूरे अंचल में स्थान-स्थान पर पचास से अधिक मेले आयोजित होते हैं जिनमें यहाँ का लोक जीवन, लोक नृत्य, गीत एवं परम्पराओं की भागीदारी सुनिश्चित होती है। साथ ही यह धारणा भी पुष्टि होती है कि अन्य भागों में मेलों, उत्सवों का ताना बाना भले ही टूटा हो, यह अंचल तो आम जन की भागीदारी से मनाये जा रहे मेलों से निरन्तर समद्ध हो रहा है। ग्रामीणों को आज भी अपनी संस्कृति, अपने लोग, अपना रंग, अपनी उमंग, अपना परिवार इन्हीं मेलों में वापस मिलते हैं।

हरिद्वार कुंभ – उत्तराखंड के हरिद्वार में कुंभ मेला बहुत बड़ा मेला होता है। चारों धामों, बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री एवं यमुनोत्री के लिये प्रवेश द्वार के रूप में प्रसिद्ध हरिद्वार में ज्योतिष गणना के आधार पर ग्रह नक्षत्रों के विशेष स्थितियों में हर बारहवें वर्ष कुम्भ के मेले का आयोजन किया जाता है।

दशहरा मेला- यह मेला अल्मोड़ा में भव्य रूप से आयोजित होता है। इसमें रावण दरबार के राक्षसों के पुतलों को बाजारों में घुमाकर फूंका जाता है। यह अनूठी परंपरा देश में और कहीं नहीं होती। हल्द्वानी, देहरादून, काशीपुर में भी ऐसा ही दशहरा मेला लगता है।

हरेला मेला–  कुमाऊं का प्रसिद्ध त्यौहार हरेला होता है। यह साल में तीन बार चैत्र नवरात्र और श्रावण नवरात्र के अलावा अश्विन माह में मनाया जाता है। हरेला मेले का आयोजन भीमताल शहर में हर साल हरेला त्योहार के मौके पर 16 व 17 जुलाई को होता है।

उत्तरायनी मेला-वागेश्वर में एतिहासिक, धार्मिक व पारंपरिक दृष्टि से आयोजित इस मेले का आयोजन जनवरी मास में मकर सक्रांति के दिन आयोजित होता है।

नंदाअष्टमी मेला-नंदाअष्टमी मेला तो पूरे कुमाऊं क्षेत्र में आयोजित होता है, लेकिन नैनीताल में नंदादेवी मंदिर और भुवाली का मेला खास है। सितंबर-अक्टूबर में शुक्ल पक्ष अष्टमी के मौके पर नंदाअष्टमी मनाई जाती है। पर्यटक खासतौर पर नंदाअष्टमी मेला देखने के लिए नैनीताल में आते हैं।

जिया रानी का मेला – उत्तरायणी में प्रतिवर्ष रानीबाग में वीरांगना जिया रानी के नाम पर जिया रानी का मेला लगता है। रानीबाग, काठगोदाम से 5 किमी दूर अल्मोड़ा मार्ग पर बसा है। रानीबाग में कव्यूरी राजा धामदेव और ब्रह्मदेव की माता जियारानी का बाग था। उत्तरायणी के अवसर पर यहां एक ओर स्नान चलता है तो दूसरी ओर जागर। इसके अलावा बैर आदि को सुनने वालों की भी भीड़ रहती है ।

शरदोत्सव या हेमंतोत्सव- नैनीताल में यह लगता है। यहां मुंबई से कलाकारों, गायकों आदि को बुलाया जाता है। इसके अलावा कुमाऊं के सांस्कृतिक आयोजन भी इस उत्सव के दौरान कौतूहल पैदा करते हैं।

गर्जिया मेला- रामनगर से करीब 12 किमी दूर पहाड़ की चोटी पर माता गर्जिया (गिरिजा) का मंदिर है। गर्जिया मंदिर में सालभर भक्तों का तांता लगा रहता है, लेकिन कार्तिक पूर्णिमा के मौके पर यहां मेला लगता है जहाँ बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं का तांता लगता है।

कालसन का मेला – कालसन का मेला नैनीताल जनपद के टनकपुर के पास सूखीढ़ांग व श्यामलाताल की पावन भूमि में हर साल आयोजित किया जाता है। यहां त्रिशूलों में लोग दीप जलाते हैं तथा काले रंग का वस्त्र भी बांधते हैं। उत्तराखंड के अन्य मन्दिरों की तरह यहां भी घंटियां, ध्वजा आदि चढ़ाने की परम्परा है । भूत, प्रेत आदि बाधाओं से पीड़ित व्यक्ति यहां ईलाज के लिए भी लाए जाते हैं। पूर्णिमा को यहां मेला लगता है तथा देवता को नारियल आदि अर्पित करते हैं।

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