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Wednesday, April 21, 2021
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भारत और श्रीलंका को जोड़ने वाले रामसेतु जिसे दुनिया एडम्स ब्रिज के नाम से जानती है, आइये जाने इससे जुड़ा रहस्य

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भारत और श्रीलंका को जोड़ने वाले रामसेतु जिसे दुनिया एडम्स ब्रिज के नाम से भी जानती है। भौगोलिक प्रमाणों से पता चलता है कि किसी समय यह सेतु भारत तथा श्रीलंका को भू मार्ग से आपस में जोड़ता था। हिन्दू पुराणों की मान्यताओं के अनुसार इस सेतु का निर्माण अयोध्या के राजा राम श्रीराम की सेना के दो सैनिक जो की वानर थे, जिनका वर्णन प्रमुखतः नल-नील नाम से रामायण में मिलता है, द्वारा किया गया था। श्रीलंका के मन्नार द्वीप से भारत के रामेश्वरम तक चट्टानों की जिस चेन को रामसेतु कहा जाता है दुनिया में एडम्स ब्रिज (आदम का पुल) नाम से जाना जाता है। इस पुल की लंबाई 30 मील यानि 48 किलोमीटर है। यह ढांचा मन्नार की खाड़ी और पाक जलडमरू मध्य को एक दूसरे से अलग करता है। इस इलाक में समुद्र काफी उथला है। समुद्र में इन चट्टानों की गहराई सिर्फ 3 फुट से लेकर 30 फुट के बीच है।अनेक जगहों पर यह सूखी और कई जगहों पर उथली है जिसके चलते जहाजों की आवाजाही मुमकिन नहीं है। इसके बारे में कहा जाता है कि 15वीं शताब्दी में इस ढांचे पर चलकर रामेश्वर से मन्नार द्वीप तक जाया जा सकता था। लेकिन, तूफानों ने समुद्र को कुछ और गहरा किया और 1480 ईस्वी में यह चक्रवात के चलते टूट गया।  साल 2005 में भारत सरकार ने सेतुसमुद्रम परियोजना का ऐलान किया था। इसके तहत एडम्स ब्रिज के कुछ इलाकों को हरना कर समुद्री जहाजों के लायक बनाए जाने की योजना थी। इसके लिए कुछ चट्टों को तोड़ना जरुरी था। सेतु समुद्रम परियोजना पूरी होने के बाद सारे अंतरराष्ट्रीय जहाज कोलंबो बंदरगाह का लंबा मार्ग छोड़कर इसी नहर से गुजरेंगें, अनुमान है कि 2000 या इससे अधिक जलपोत प्रतिवर्ष इस नहर का उपयोग करेंगे।

रामसेतु का रहस्य:

हिंदु धार्मिक ग्रंथों के अनुसार रामेसेतु एक ऐसा पुल है जिसे मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने वानर सेना संग लंका पहुंचने के लिए बनवाया था। यह पुल रामेश्वरम से श्रीलंका मन्नार को जोड़ता है। रामेश्वरम औऱ श्रीलंका के बीच बहुत से ऐसे पत्थर मौजूद हैं जो करीब 7000 साल पुराने हैं।

रावण का वध करने के लिए जब भगवान श्री राम लंका पहुंचे तो उनके लिए सबसे बड़ी समस्या थी रावण के लंका तक पहुंचना। इसके लिए भगवान श्री रामचंद्र जी को इस समुद्र को पार करना था। इसके लिए भगवान राम ने रामसेतु के निर्माण की योजना बनाई। रामसेतु के निर्माण हेतु जब भगवान श्री राम ने समुद्र देव से मदद मांगी तो समुद्र देव ने बताया कि आपकी सेना में नल और नील एसे ऐसे प्रांणी हैं जिन्हें इस पुल के निर्माण की पूरा जानकारी है। समुद्र देव ने भगवान राम से कहा कि नल और नील आपकी आज्ञा से सेतु बनाने के कार्य में अवश्य सफल होंगे। रामसेतु के निर्माण महज 5 से 6 दिनों में पूरा हुआ था। जी हां आपको यह सुनकर जरूर हैरानी होगी कि इसके निर्माण में महज 5 से 6 दिन लगे थे। इस बात को अमेरिकी वैज्ञानिकों ने भी स्वीकार किया है। आपको बता दें समुद्र की लंबाई लगभग 100 योजन है। एक योजन में लगभग 13 से 14 किलोमीटर होते हैं यानि रामसेतु की लंबाई करीब 1400 किलोमीटर है। रावण का वध कर श्रीलंका से लौटने के बाद भगवान राम ने रामसेतु को समुद्र में डुबो दिया था। ताकि कोई भी इसका दुरुपयोग ना कर सके। यह घटना युगों पहले की बताई जाती है। लेकिन कालांतर में बताया जाता है कि समद्र का जल स्तर घटता गया और सेतु फिर से ऊपर आता गया। रामसेतु के निर्माण के दौरान सेतु के निर्माण कार्य के पूरा होने के लिए भगवान राम ने विजया एकादशी के दिन स्वयं बकदालभ्य ऋषि के कहने पर व्रत रखा था। नल तथा नील की मदद से रामसेतु का निर्माण पूर्ण हुआ था। वैज्ञानिकों के अनुसार रामसेतु पुल को बनाने के लिए जिन पत्थरों का इस्तेमाल हुआ था वे‘प्यूमाइस स्टोन’ थे। ये पत्थर ज्वालामुखी के लावा से उत्पन्न होते हैं।

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