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Monday, October 26, 2020
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अरेंज मैरिज’ कल्चर दिखाने के बहाने इस नेटफ्लिक्स सीरीज ने कई दिक्कत भरी बातें दिखा डाली

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नेटफ्लिक्स पर इस वक़्त ‘इंडियन मैचमेकिंग’ नाम की सीरीज आई है. इसकी चर्चाएं सोशल मीडिया पर काफी वायरल हो रही हैं. इस सीरीज में सीमा तपारिया नाम की मैचमेकर भारत और अमेरिका में लोगों के लिए रिश्ते ढूंढने का काम करती हैं. इस सीरीज की सोशल मीडिया पर काफी खिंचाई हो रही है . इसे मिसोजिनिस्ट कहा जा रहा है. यानी महिलाविरोधी. ये भी कहा जा रहा है कि इसमें जो भी चीज़ें दिखाई गई हैं, वो बेहद पिछड़ी हुई सोच की हैं.

नेटफ्लिक्स की ये सीरीज आठ एपिसोड्स की है. अलग-अलग भारतीय और इंडियन-अमेरिकन लोगों के जीवन को दिखाती है, जो अपने लिए पार्टनर ढूंढ रहे हैं. भारत और अमेरिका में शूट हुई है. इसकी नैरेटर हैं सीमा तपारिया, जो अपने क्लाइंट्स के लिए अमेरिका भी जाती हैं. तो उनकी जर्नी भी दिखाई गई है. कुछ चीज़ें जो इन सबके बीच ध्यान खींचती हैं:

विदेश में भारतीय

इस सीरीज की एक बहुत बड़ी दिक्कत ये महसूस होती है कि विदेशों में बसे भारतीयों को भी एक खास नज़र से दिखाया गया है. सीरीज के दो प्रोड्यूसर्स अमेरिकन हैं. उनकी नज़र से कई चीज़ें ऐसी दिखती हैं सीरीज में, जो बेहद प्रॉब्लमैटिक हैं. जैसे भारतीय डायस्पोरा (लोग जो विदेश में रहते हैं). उनके दिखाए हुए एग्जाम्पल ऐसे हैं, जो काफी पिछड़े हुए स्टीरियोटाइप्स फॉलो करते हैं.

नादिया जगेसर, जो कि भारतीय मूल की है, लेकिन उसके पूर्वज गयाना नाम के देश में बस गए थे. वो भी बताती है कि किस तरह भारतीय लोग उसे पूरी तरह अपना नहीं पाते. क्योंकि वो गयाना की है. पूरी तरह ‘भारतीय’ नहीं है. इस पूरे ट्रीटमेंट से विदेशों में रह रहे भारतियों की छवि एक ऐसे पिछड़े हुए समूह की बनती है, जो ओपन नहीं है.

पॉवर्टी पॉर्न

भारत में सीरीज मुख्यतः मुंबई और दिल्ली में फोकस्ड है. जब भी भारत के सीन आते हैं सीरीज में, सितार बजना शुरू हो जाता है. शॉट्स ऐसे लिए जाते हैं जो ‘स्लमडॉग मिलियनेयर’ की याद दिला देते हैं. कई सीन्स में एक समाज के तौर पर भारतीय लोगों को ‘exoticise’ करने की कोशिश दिखाई पड़ती है. exoticise मतलब किसी विदेशी वस्तु/व्यक्ति/परम्परा को एक अटेंशन की चीज़ की तरह इस्तेमाल करना.

एक थर्ड वर्ल्ड कंट्री के बारे में बनी हुई इमेज को भुनाते हुए शॉट्स जब रिश्ता ढूंढने वाले लोगों तक पहुंचते हैं, तो ये गरीबी गायब हो जाती है. क्योंकि सीमा तपारिया की फीस भरने की कूवत किसी आम मध्यवर्गीय परिवार की नहीं. इनके क्लाइंट्स बड़े-बड़े बिजनेसमैन हैं. करोड़ों के व्यापार करने वाले. महंगी गाड़ियों में चलने वाले. लेकिन इन गाड़ियों से बाहर की दुनिया दिखाना इस सीरीज का हिस्सा नहीं. उनके शॉट्स सिर्फ इसलिए मौजूद हैं ताकि देखने वालों को याद दिलाया जा सके कि वो भारत में हैं.

यही नहीं. चेहरा पढ़ने वालों के पास जाना, कुंडली मिलवाना, ये सब एलिमेंट भी ऐसे लगते हैं जो एक वाइट ऑडियंस का कौतूहल जगाने के लिए रखे गए. आखिर में ये चेहरा पढ़ने और कुंडली मिलाने वालों की कही गई बात भी किसी काम नहीं आती. उनके दावे झूठे साबित होते हैं.

कितना सच?

सीरीज देखकर ये अहसास होता है कि ये भारत के लोगों के लिए बनाई ही नहीं गई. उन श्वेत अमेरिकी लोगों के लिए बनाई गई है, जो ये जानना चाहते हैं कि इन ‘ब्राउन कम्यूनिटीज’ में चलता क्या है. कैसे होता है सब. उनके लिए ‘अरेंज’ मैरिज का कॉन्सेप्ट ही बेहद अजीब है. और इस तरह मैचमेकिंग देखना उनके लिए एक कौतूहल का विषय.

लेकिन जो बात उन्हें पता नहीं, वो ये कि जिन लोगों पर फोकस किया जा रहा है इस सीरीज में, वो भारत की जनसंख्या का एक बेहद छोटा हिस्सा है. देश में अधिकतर लड़कियों के लिए अरेंज मैरिज एक चॉइस नहीं, मजबूरी है. जिससे वो चाहकर भी छुटकारा नहीं पा सकतीं. जिससे उनके परिवार छुटकारा नहीं पा सकते. ऐसी लड़कियां जिनके पास डेटिंग ऐप्स ट्राई करना तो दूर, उनके बारे में सोचने तक की आज़ादी नहीं. और उन लड़कियों की कहानी ये नहीं है. क्योंकि सीमा तपारिया रिश्ते अरेंज करने की कथित तौर पर जो फीस लेती हैं, वो इन में से कई परिवारों की छह महीने की कमाई है.

चलते चलते बता दें कि शो में जिन भी लोगों के रिश्ते कराने की ज़िम्मेदारी सीमा तपारिया ने उठाई थी, उनमें से सभी अभी तक सिंगल हैं. अक्षय, जिसके रोके के साथ बात ख़त्म हुई थी शो पर, उसने LA टाइम्स को दिए इंटरव्यू में कहा कि ‘बाद में हमें कुछ ऐसी चीज़ें पता चलीं जिसके साथ हम कम्फर्टेबल नहीं थे. इसलिए हमने रिश्ता तोड़ दिया’.

अब सुनने में ये आ रहा है कि इसका अगला सीज़न भी आएगा. लेकिन इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है

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