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Friday, January 22, 2021
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जानिए उत्तराखंड का प्राचीन काल का इतिहास

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उत्तराखंड का इतिहास उतना ही पुराना है जितना कि मानव जाति का। यहाँ कई शिलालेख, ताम्रपत्र व प्राचीन अवशेष भी प्राप्त हुए हैं। जिससे गढ़वाल की प्राचीनता का पता चलता है। गोपेश्नर में शिव-मंदिर में एक शिला पर लिखे गये लेख से ज्ञात होता है कि कई सौ वर्ष से यात्रियों का आवागमन इस क्षेत्र में होता आ रहा है। मार्कण्डेय पुराण, शिव पुराण, मेघदूत व रघुवंश महाकाव्य में यहाँ की सभ्यता व संस्कृति का वर्णन हुआ है। बौधकाल, मौर्यकाल व अशोक के समय के ताम्रपत्र भी यहाँ मिले हैं। इस भूमी का प्राचीन ग्रन्थों में देवभूमि या स्वर्गद्वार के रूप में वर्णन किया गया है। पवित्र गंगा हरिद्वार में मैदान को छूती है। प्राचीन धर्म ग्रन्थों में वर्णित यही मायापुर है। गंगा यहाँ भौतिक जगत में उतरती है। इससे पहले वह सुर-नदी देवभूमि में विचरण करती है। इस भूमी में हर रूप शिव भी वास करते हैं, तो हरि रूप में बद्रीनारायण भी। माँ गंगा का यह उदगम क्षेत्र उस देव संस्कृति का वास्तविक क्रिड़ा क्षेत्र रहा है जो पौराणिक आख्याओं के रूप में आज भी धर्म-परायण जनता के मानस में विश्वास एवं आस्था के रूप में जीवित हैं। उत्तराखंड की प्राचीन जातियों में किरात, यक्ष, गंधर्व, नाग, खस, नाथ आदी जातियों का विशेष उल्लेख मिलता है। आर्यों की एक श्रेणी गढ़वाल में आई थी जो खस (खसिया) कहलाई। यहाँ की कोल भील, जो जातियाँ थी कालांतर में स्वतंत्रता प्राप्ति के बात हरिजन कहलाई। देश के विभिन्न क्षेत्रों से लोग यात्री के रूप में बद्रीनारायण के दर्शन के लिए आये उनमें से कई लोग यहाँ बस गये और उत्तराखंड को अपना स्थायी निवास बना दिया। ब्राह्मण, क्षत्रीय, वैश्य, मुस्लिम, सिख, ईसाई सभी यहाँ रहने लगे। मुख्य रूप से इस क्षेत्र में ब्राह्मण एवं क्षत्रीय जाति के लोगों का निवास अधिक है। उत्तराखंड राज्य बनने के बाद हरिद्वार, उधमसिंह नगर एवं कुछ अन्य क्षेत्रों को मिलाने से अन्य जाती के लोगों में अब बढोत्री हो गई है। इस क्षेत्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि धरातल पर यदि कहीं समाजवाद दिखाई देता है तो वह इस क्षेत्र में देखने को मिलता है इसलिए यहाँ की संस्कृति संसार की श्रेष्ठ संस्कृतियों में मानी जाती है। सातवीं सदी के गढ़वाल का एतिहासिक विवरण प्राप्त है। 688 ई0 के आसपास चाँदपुर, गढ़ी (वर्तमान चमोली जिले में कर्णप्रयाग से 13 मील पूर्व ) में राजा भानुप्रताप का राज्य था। उसकी दो कन्यायें थी। प्रथम कन्या का विवाह कुमाऊं के राजकुमार राजपाल से हुआ तथा छोटी का विवाह धारा नगरी के राजकुमार कनकपाल से हुआ इसी का वंश आगे बढा।

प्राचीन काल-

प्राचीन कल में उत्तराखंड पर अनेक जातियों ने शासन किया जिनमे से  कुछ प्रमुख निम्नलिखित है

कुणिन्द शासक –

  • कुणिन्द उत्तराखंड पर शासन करने वाली पहली राजनैतिक शक्ति थी |
  • अशोक के कालसी अभिलेख से ज्ञात होता है की कुणिन्द प्रारंभ में मौर्यों के अधीन थे |
  • कुणिन्द वंश का सबसे शक्तिशाली राजा अमोधभूति था |
  • अमोधभूति की मृत्यु के बाद उत्तराखंड के मैदानी भागो पर शको ने अधिकार कर लिया , शको के बाद  तराई वाले भागो में कुषाणों ने अधिकार कर लिया |
  • उत्तराखंड में यौधेयो के शाशन के भी  प्रमाण मिलते है इनकी मुद्राए जौनसार बाबर तथा लेंसडाउन ( पौड़ी ) से मिली है |
  • ‘ बाडवाला यज्ञ वेदिका ‘ का निर्माण शीलवर्मन नामक राजा ने किया था , शील वर्मन को कुछ विद्वान कुणिन्द व कुछ यौधेय मानते है |

कर्तपुर राज्य – 

  • कर्तपुर राज्य के संस्थापक भी कुणिन्द ही थे  कर्तपुर में उत्तराखंड , हिमांचल प्रदेश तथा रोहिलखंड का उत्तरी भाग सामिल था |
  • कर्तपुर के कुणिन्दो  को पराजित कर नागो ने उत्तराखंड पर अपना अधिकार कर लिया |
  • नागो के बाड़ कन्नोज के मौखरियो ने उत्तराखंड पर शासन किया |
  • मौखरी वंश का अंतिम शासक गृह्वर्मा था हर्षवर्धन ने इसकी हत्या करके शासन को अपने हाथ में ले लिया |
  • हर्षवर्धन के शासन काल में चीनी यात्री व्हेनसांग उत्तराखंड भ्रमण पर आया था |

कार्तिकेयपुर राजवंश –

  • हर्ष की मृत्यु के बाद उत्तराखंड पर अनेक छोटी – छोटी शक्यियो ने शासन किया , इसके पश्चात 700 ई . में कर्तिकेयपुर राजवंश की स्थापना हुइ , इस वंश के तीन से अधिक परिवारों ने उत्तराखंड पर 700 ई . से 1030 ई. तक लगभग 300 साल तक शासन किया |
  • इस राजवंश को उत्तराखंड का प्रथम ऐतिहासिक राजवंश कहा जाता है |
  • प्रारंभ में कर्तिकेयपुर राजवंश की राजधानी जोशीमठ (चमोली ) के समीप कर्तिकेयपुर नामक स्थान पर  थी बाद में राजधानी बैजनाथ (बागेश्वर ) बनायीं गयी |
  • इस वंस का प्रथम शासक बसंतदेव था बसंतदेव के बाद के राजाओ के बारे में कोई जानकारी नहीं मिलाती है इसके बाद  खर्परदेव के शासन के बारे में जानकारी मिलती है  खर्परदेव कन्नौज के राजा यशोवर्मन का समकालीन था  इसके बाद इसका पुत्र कल्याण राजा बना , खर्परदेव वंश का अंतिम शासक त्रिभुवन राज था |
  • नालंदा अभिलेख में बंगाल के पाल शासक धर्मपाल द्वारा गढ़वाल पर आक्रमण करने की जानकारी मिलती है इसी आक्रमण के बाद कार्तिकेय राजवंश में खर्परदेव वंश के स्थान पर निम्बर वंश की स्थापना हुई , निम्बर ने जागेश्वर में विमानों का निर्माण करवाया था
  • निम्बर के बाद  उसका पुत्र इष्टगण शासक बना उसने समस्त उत्तराखंड को एक सूत्र में बांधने का प्रयास किया था जागेश्वर में नवदुर्गा , महिषमर्दिनी , लकुलीश तथा नटराज मंदिरों का निर्माण कराया |
  • इष्टगण के बाद  उसका पुत्र ललित्शूर देव शासक बना तथा ललित्शूर देव के बाद  उसका पुत्र भूदेव शासक बना इसने बौध धर्मं का विरोध किया तथा बैजनाथ मंदिर निर्माण में सहयोग दिया |
  • कर्तिकेयपुर राजवंश में सलोड़ादित्य के पुत्र इच्छरदेव ने  सलोड़ादित्य वंश की स्थापना की
  • कर्तिकेयपुर शासनकाल में आदि गुरु शंकराचार्य उत्तराखंड आये उन्होंने बद्रीनाथ व केदारनाथ मंदिरों का पुनरुद्धार कराया | सन 820 ई . में केदारनाथ में उन्होंने अपने प्राणों का त्याग किया |
  • कर्तिकेयपुर शासको की राजभाषा संस्कृत तथा लोकभाषा पाली थी |

    मध्य काल-

    मध्यकाल के इतिहास में हम कत्यूरी शासन , चन्द वंश तथा गढ़वाल के परमार (पवांर ) वंश के बारे में अध्ययन करेंगे |

    कत्यूरी वंश 

    • मध्यकाल में कुमाऊं में कत्यूरियों का शासन था इसके बारे में जानकारी हमें स्थानीय लोकगाथाओं व जागर से मिलती है कर्तिकेयपुर वंश के बाद कुमाऊं में कत्यूरियों का शासन हुआ |
    • सन् 740 ई. से 1000 ई. तक गढ़वाल व कुमाऊं पर कत्यूरी वंश के तीन परिवारों का शासन रहा , तथा इनकी राजधानी कर्तिकेयपुर (जोशीमठ) थी|
    • आसंतिदेव ने कत्यूरी राज्य में आसंतिदेव वंश की स्थापना की और अपनी राजधानी जोशीमठ से रणचुलाकोट में स्थापित की |
    • कत्यूरी वंश का अंतिम शासक ब्रह्मदेव था यह एक अत्याचारी शासक था जागरो में इसे वीरमदेव कहा गया है|
    • जियारानी की लोकगाथा के अनुसार 1398 में तैमूर लंग ने हरिद्वार पर आक्रमण किया और ब्रह्मदेव ने उसका सामना किया और इसी आक्रमण के बाद कत्यूरी वंश का अंत हो गया|
    • 1191 में पश्चिमी नेपाल के राजा अशोकचल्ल ने कत्यूरी राज्य पर आक्रमण कर उसके कुछ भाग पर कब्ज़ा कर लिया|
    • 1223 ई. में नेपाल के शासक  काचल्देव  ने   कुमाऊॅ पर आक्रमण कर लिया और कत्यूरी शासन को अपने अधिकार में ले लिया। 

      कुमाऊं का चन्द वंश –

      • कुमाऊं में चन्द वंश का संस्थापक सोमचंद था जो 700 ई. में गद्दी पर बैठा  था|
      • कुमाऊं में चन्द और कत्यूरी प्रारम्भ में समकालीन थे और उनमें सत्ता के लिए संघर्ष चला जिसमें अन्त में चन्द विजयी रहे। चन्दों ने चम्पावत को अपनी राजधानी बनाया। प्रारंभ में चम्पावत के आसपास के क्षेत्र ही इनके अधीन थे लेकिन बाड़ में वर्तमान का नैनीताल, बागेश्वर, पिथौरागढ़, अल्मोड़ा आदि क्षेत्र इनके अधीन हो गए|
      • राज्य के विस्तृत हो जाने के कारण भीष्मचंद ने राजधानी चम्पावत से अल्मोड़ा स्थान्तरित कर दी जो कल्यांचंद तृतीय के समय (1560) में बनकर पूर्ण हुआ|
      • इस वंश का सबसे शक्तिशाली राजा गरुड़ चन्द था|
      • कल्याण चन्द चतुर्थ के समय में कुमाऊं पर रोहिल्लो का आक्रमण हुआ| तथा प्रशिद्ध कवी ‘शिव’ ने कल्याण चंद्रौदयम की रचना की|
      • चन्द शासन काल में ही कुमाऊं में ग्राम प्रधान की नियुक्ति तथा भूमि निर्धारण की प्रथा प्रारंभ हुई|
      • चन्द राजाओ का राज्य चिन्ह गाय थी|
      • 1790 ई. में नेपाल के गोरखाओं ने चन्द राजा महेंद्र चन्द को हवालबाग के युद्ध में पराजित कर कुमाऊं पर अपना अधिकार कर लिया , इसके सांथ ही कुमाऊं में चन्द राजवंश का अंत हो गया| 

        गढ़वाल का परमार राजवंश –

        • 9 वीं शताब्दी तक गढ़वाल में 54 छोटे-बड़े ठकुरी शासको का शासन था, इनमे सबसे शक्तिशाली चांदपुर गड  का राजा भानुप्रताप था , 887 ई. में धार (गुजरात) का शासक कनकपाल तीर्थाटन पर आया, भानुप्रताप ने इसका स्वागत किया और अपनी बेटी का विवाह उसके साथ कर दिया।
        • कनकपाल द्वारा 888 ई. में चाँदपुरगढ़ (चमोली) में परमार वंश की नींव रखीं, 888 ई. से 1949 ई. तक परमार वंश में कुल 60 राजा हुए।
        • इस वंश के राजा प्रारंभ में कर्तिकेयपुर राजाओ के शामंत रहे लेकिन बाड़ में स्वतंत्र राजनेतिक शक्ति के रूप  में स्थापित हो गए|
        • इस वंश के 37वें राजा अजयपाल ने सभी गढ़पतियों को जीतकर गढ़वाल भूमि का एकीकरण किया। इसने अपनी राजधानी  चांदपुर गढ को पहले देवलगढ़ फिर 1517 ई. में श्रीनगर में स्थापित किया।
        • परमार शासकों को लोदी वंश के शासक बहलोद लोदी ने शाह की उपाधि से नवाजा , सर्वप्रथम बलभद्र शाह ने अपने नाम के आगे शाह जोड़ा|
        • 1636 ई. में मुग़ल सेनापति नवाजतखां ने दून-घाटी पर हमला कर दिया ओर उस समय की गढ़वाल राज्य की संरक्षित महारानी कर्णावती ने अपनी वीरता से मुग़ल सैनिको को पकडवाकर उनके नाक कटवा दिए , इसी घटना के बाद महारानी कर्णावती को “नाककटी रानी” के नाम से प्रसिद्ध हो गयी।
        • परमार राजा प्रथ्विपति शाह ने मुग़ल शहजादा दाराशिकोह के पुत्र शुलेमान शिकोह को आश्रय दिया था इस बात से औरेंजेब नाराज हो गया था|
        • 1790 ई. में कुमाऊॅ के चन्दो को पराजित कर, 1791 ई. में गढ़वाल पर भी आक्रमण किया लेकिन पराजित हो गए। गढ़वाल के राजा ने गोरखाओं से संधि के तहत 25000 रूपये का वार्षिक कर लगाया और वचन लिया की ये पुन: गढ़वाल पर आक्रमण नहीं करेंगे , लेकिन 1803 ई. में अमर सिंह थापा और हस्तीदल चौतरिया के नेतृत्व में गौरखाओ ने भूकम से ग्रस्त गढ़वाल पर आक्रमण कर उनके काफी भाग पर कब्ज़ा कर लिया।
        • 14 मई 1804 को देहरादून के खुड़बुड़ा मैदान में गोरखाओ से हुए युद्ध में प्रधुमन्न  शाह की मौत हो गई , इस प्रकार सम्पूर्ण गढ़वाल और कुमाऊॅ में नेपाली गोरखाओं का अधिकार हो गया।
        • प्रधुमन्न  शाह के एक पुत्र कुंवर प्रीतमशाह को गोरखाओं ने बंदी बनाकर काठमांडू भेज दिया, जबकि दुसरे पुत्र सुदर्शनशाह हरिद्वार में रहकर स्वतंत्र होने का प्रयास करते रहे और उनकी मांग पर अंग्रेज गवर्नर जनरल लार्ड हेस्टिंग्ज ने अक्तूबर 1814 में गोरखा के विरुद्ध अंग्रेज सेना भेजी और 1815 को गढ़वाल को स्वतंत्र कराया  , लेकिन अंग्रेजों को लड़ाई का खर्च न दे सकने के कारण गढ़वाल नरेश को समझौते में अपना राज्य अंग्रेजों को देना पड़ा।
        • शुदर्शन शाह  ने 28 दिसम्बर 1815 को अपनी राजधानी श्रीनगर से टिहरी गढ़वाल  स्थापित  की। टिहरी राज्य पर राज करते रहे तथा भारत में विलय के बाद टिहरी राज्य को 1 अगस्त 1949 को उत्तर प्रदेश का एक जनपद बना दिया गया।
        • पंवार शासको के काल में अनेक काव्य रचे गए जिनमे सबसे प्राचीन मनोदय काव्य है जिसकी रचना भरत कवि ने की थी ।

          आधुनिक काल-

          उत्तराखंड के आधुनिक काल के इतिहास में गोरखा शासन तथा ब्रिटिश शासन –

          गोरखा शासन –

          • गोरखा नेपाल के थे , गोरखाओ ने चन्द राजा को पराजित कर 1790 में अल्मोड़ा पर अधिकार कर लिया|
          • कुमाऊॅ  पर अधिकार करने के बाद 1791 में गढ़वाल पर आक्रमण किया लेकिन पराजित हो गये और फरवरी 1803 को संधि के विरुद्ध जाकर गोरखाओं ने अमरसिंह थापा और हस्तीदल चौतारिया के नेतृत्व में  पुन: गढ़वाल पर आक्रमण किया और सफल हुए।
          • 14 मई 1804 को गढ़वाल नरेश प्रधुम्न्ना शाह और गोरखों के बीच देहरादून के खुडबुडा मैदान में युद्ध हुआ और गढ़वाल नरेश शहीद हो गए|
          • 1814  ई. में  गढ़वाल में अंग्रेजो के साथ युद्ध में पराजित हो कर गढ़वाल राज मुक्त हो गया, अब  केवल कुमाऊॅ  में गोरखाओं का शासन रह गया|
          • कर्नल निकोल्स  और  कर्नल गार्डनर  ने अप्रैल  1815 में कुमाऊॅ के अल्मोड़ा को व जनरल ऑक्टरलोनी  ने 15, मई  1815 को वीर गोरखा सरदार अमर सिंह थापा  से मालॉव का किला जीत लिया।
          • 27 अप्रैल  1815 को कर्नल गार्डनर तथा गोरखा शासक बमशाह के बीच हुई संधि के तहत कुमाऊॅ की सत्ता अंग्रेजो को सौपी दी गई।
          • कुमाऊॅ व गढ़वाल में गोरखाओं का शासन काल क्रमश: 25 और 10.5 वर्षों तक रहा।जो  बहुत ही अत्याचार पूर्ण था  इस अत्चयारी शासन को गोरख्याली कहा जाता है| 

            ब्रिटिश शासन –

            • अप्रैल   1815 तक कुमाऊॅ पर अधिकार करने के बाद अंग्रेजो ने टिहरी को छोड़ कर अन्य सभी क्षेत्रों को नॉन रेगुलेशन   प्रांत बनाकर उत्तर पूर्वी प्रान्त का भाग  बना दिया, और इस क्षेत्र का प्रथम कमिश्नर कर्नल गार्डनर  को नियुक्त किया।
            • कुछ समय बाड़ कुमाऊँ जनपद का गठन किया गया और देहरादून को 1817 में सहारनपुर जनपद में सामिल किया गया।
            • 1840 में ब्रिटिश गढ़वाल के मुख्यालय   को श्रीनगर से हटाकर पौढ़ी लाया गया व पौढ़ी गढ़वाल नामक नये जनपद का गठन किया।
            • 1854 में कुमाऊँ मंडल का मुख्यालय नैनीताल बनाया गया।
            • 1891 में कुमाऊं को अल्मोड़ा व नैनीताल नामक दो जिलो में बाँट दिया गया, और स्वतंत्रता तक कुमाऊॅ में केवल 3 ही ज़िले थे (अल्मोड़ा, नैनीताल, पौढ़ी गढ़वाल) और टिहरी गढ़वाल एक रियासत के रूप में थी।
            • 1891 में उत्तराखंड से नॉन रेगुलेशन प्रान्त सिस्टम को समाप्त कर  दिया गया।
            • 1902 में सयुंक्त प्रान्त आगरा एवं अवध का गठन हुआ और उत्तराखंड को इसमें सामिल कर दिया गया।
            • 1904 में नैनीताल गजेटियर में उत्तराखंड को हिल स्टेट का नाम दिया गया।

           

       

     

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