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Wednesday, April 21, 2021
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जानिए उत्तराखंड को अलग राज्य बनाने के लिए हुए आंदोलन के बारे में

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उत्तराखंड राज्य के गठन के लिए एक बहुत लंबे संघर्ष और बलिदान के परिणाम के रूप में हुआ। पृथक उत्तराखंड की मांग को लेकर कई वर्षों तक चले आंदोलन के बाद आखिरकार 9 नवंबर 2000 को उत्तराखण्ड को सत्ताइसवें राज्य के रूप में भारत गणराज्य के शामिल किया गया। वर्ष 2000 से 2006 तक इसे उत्तरांचल के नाम से पुकारा जाता था, लेकिन जनवरी 2007 में स्थानीय लोगों की भावनाओं का सम्मान करते हुए इसका आधिकारिक नाम बदलकर उत्तराखण्ड कर दिया गया।

उत्तराखंड राज्य को पृथक राज्य बनाने हेतु आंदोलन:

  • 1938 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का श्रीनगर में विशेष अदिवेशन 5-6 मई  को हुआ। जिसकी अध्याक्षता  जवाहर लाल नेहरु ने की। इस अधिवेशन में सर्वप्रथम गढ़वाल व कुमाऊँ को मिलाकर एक नया राज्य बनाने की माग की।
  • 1946 में हल्द्वानी में बद्रिदात पाण्डेय की अध्याक्षता  में कांग्रेस का एक सम्मेलन हुआ जिसमे उत्तराँचल के पर्वतीय भू-भाग को विशेष वर्ग में रखने की माग  की।
  • इसी अधिवेशन में अनुसूइया प्रसाद बहुगुणा ने गढ़वाल तथा कुमाऊँ के प्रतेक इकाई बनाने की माग की, जिसे गोबिंध बल्लभ पन्त द्वारा ठुकरा दिया गया।
  • 1950 में हिमांचल तथा उत्तराँचल को मिलाकर एक वृहद हिमालय राज्य बनाने की माग की गयी। जिसके लिए एक पर्वतीय विकास जन समिति नामक संगठन का गठन किया गया।
  • 1952 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी(भाकपा) के तत्कालीन महासचिव पूरन चंद जोशी ने प्रथम राज्य की माँग को लेकर भारत सरकार को ज्ञापन सौपा। उसके पश्चात वीर चन्द्र गढ़वाली ने जवाहर लाल नेहरु के समक्ष योजना का प्रारूप प्रस्तुत किया।
  • 1955 में फजल अली आयोग ने उत्तर प्रदेश के पुनर्गठन हेतु पृथक क्षेत्र बनाने की माग की। इसे उत्तर प्रदेश के नेताओ द्वारा अस्वीकार कर दिया गया।
  • 1957 में टिहरी रियासत के अंतिम राजा मानवेन्द्र शाह ने पृथक राज्य आन्दोलन को अपने स्थर से प्रारंभ किया।
  • 24-25 जून 1967 को रामनगर में पर्वतीय राज्य परिषद की सथापना की गयी। इसके अध्यक्ष दयाकृष्ण पाण्डेय को बनाया गया।इसके उपाध्यक्ष गोबिंद सिंह मेहरा और महासचिव नारायण दत्त थे।
  • 1969 में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा उत्तरांचल क्षेत्रों में विकास हेतु पर्वतीय विकास परिषद की स्थापना की गयी।
  • 3 अक्तूबर 1970 को भाकपा के महासचिव पूरन चंद जोशी ने कुमाऊँ राष्ट्रीय मोर्चा का गठन किया तथा एक नये राज्य की माग की।
  • 1972 में नैनीताल में उत्तराँचल परिषद का गठन हुआ। इस परिषद के सदस्यों द्वारा दिल्ली में धरना दिया गया।
  • 1973 में दिल्ली चलो का नारा दिया गया। प्रताप सिंह नेगी ने बद्रीनाथ से दिल्ली  तक पैदल यात्रा तय की।
  • 1976 में उत्तखंड युवा परिषद का गठन किया गया।
  • 1978 में उत्तखंड युवा परिषद के सदस्यों द्वारा संसद का घेराव किया गया।
  • 1979 में उत्तराखंड क्रांति दल (यूकेडी) का गठन किया गया। इसके द्वारा 24-25 जुलाई 1979 को मंसूरी में पर्वतीय जन विकास समिति का गठन किया गया तथा यूकेडी की स्थापना की गयी थी।
  • यूकेडी(UKD) के प्रथम अध्यक्ष देवी दत्त पन्त को बनाया गया। यूकेडी द्वारा 8 पर्वतीय जिलो को मिलाकर एक विशेष राज्य बनाने की माग  की गयी।
  • तेपन सिंह नेगी के नेतृत्व में उत्तराँचल राज्य परिषद की माग की गयी तथा 23 जुलाई को इन्होने दिल्ली में रैली  का आयोजन किया गया।
  • 1987 में यूकेडी का विभाजन हुआ। इसके नए नेता काशी  सिंह ऐरी बने। 23 नवम्बर को दिल्ली में धरना दिया गया तथा राष्ट्रपति को ज्ञापन सौपा गया तथा हरिद्वार को उत्तरांचल में शामिल करने की माग की गयी।
  • त्रिवेंद पवार द्वारा  23 अप्रैल को संसद में बम फैका गया था
  • लालकृष्ण आडवाणी की अध्यक्षता में अल्मोड़ा के पार्टी सम्मेलन में एक पृथक राज्य बनाने की माँग की गयी परन्तु उत्तराखंड की जगह इसका  उत्तराँचल नाम प्रस्तावित किया गया।
  • 1988 में सोबन सिंह जीना द्वारा उत्तरांचल उत्थान परिषद (Uttaranchal  Development Council)की स्थापना की गयी
  • 1989 में उत्तरांचल संयुक्त संघर्ष समिति का गठन किया गया
  • 11-12 फ़रवरी 1989 को रैली  आयोजित की गयी।इसके अध्यक्ष द्वारिका प्रसाद उनियाल को बनाया गया
  • 1990 में यूकेडी  के विधायक के रूप में जसवंत सिंह बिष्ट द्वारा उत्तर प्रदेश विधानसभा में पृथक राज्य का प्रस्ताव रखा गया।किसी भी विधायक द्वारा यह पहला प्रस्ताव था।
  • 1991 में भाजपा द्वारा चुनाव में पृथक राज्य की माग को लेकर 20 अगस्त 1991 को प्रदेश की भाजपा सरकार ने पृथक उत्तराँचल राज्य का प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा
  • 1992 में यूकेडी का चमोली के गैरसैंण में अधिवेशन हुआ जिसमे  गैरसैंण को राज्य की राजधानी प्रस्तावित किया गया इसे उत्तराखंड का पहला ब्लू प्रिंट माना जाता है
  • 1993 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने नगर विकास मंत्री रमाशंकर कौशिक की अध्यक्षता में उत्तराखंड राज्य हेतु एक कैबिनेट समिति बनाई
  • 1994 में कौशिक समिति ने मई 1994 में अपनी रिपोर्ट दी तथा गैरसैंण को राज्य की राजधानी बनाने की सिफारिश की गयी। कौशिक समिति की सिफ़ारिशो को 21 जून 1994 को स्वीकार किया गया।
  • 1 सितम्बर 1994 को उधमसिंह नगर के खटीमा में पुलिस द्वारा रैली पर गोलिया चलाई गयी जिसमे कई लोग शहीद हुए
  • 2 सितम्बर 1994 को मंसूरी के झूला घर में खटीमा घटना का विरोध कर रहे लोगो पर पुलिस ने हमला कर दिया तथा 2 महिलाए हँसा घनाई तथा बेला मति चौहान शहीद हुई और साथ ही पुलिस अधिक्षक उमा कान्त त्रिपाठी भी शहीद हुए।
  • 2 अक्टूबर 1994 को दिल्ली में होने वाली रैली में भाग लेने जा रहे आन्दोलनकरियो को रामपुर तिराहे(मुजफ्फरपूरा) पर पुलिस ने घेर लिया गया। पुरुषों की तलाशी के नाम पर बसों से निचे उतारा गया तथा महिलाओं के साथ अभद्र व्यवहार करा गया। इस घटना को क्रुर शासक की क्रुर साजिश कहा गया।
  • पुरुषों पर गोलिया चलाई गयी जिसमे कई लोग शहीद हुए इस घटना को रोम का नीरो कांड भी कहा जाता है
  • 10 नवम्बर 1994 को श्री यंत्र टापू कांड हुआ जिस घटना में यशोधर बेंजवाल तथा राजेश रावत शहीद हुए
  • 25 जनवरी 1995 उत्तरांचल आन्दोलन संचालन समिति ने संविधान बचाओ यात्रा निकाली
  • 15 अगस्त 1996 को तत्कालीन प्रधानमंत्री हरदनहल्ली डोडेगौडा देवगौडा (H. D. Deve Gowda) ने लालकिले से उत्तखंड राज्य की घोषणा की
  • 27 जुलाई 2000 को उत्तर प्रदेश पुनर्गठन विधेयक लोकसभा में प्रस्तुत किया गया
  • 1 अगस्त 2000 को यह विधेयक लोकसभा में पास हो गया
  • 10 अगस्त 2000 को यह विधेयक राज्य सभा में भी पारित हो गया
  • 28 अगस्त 2000 को राष्ट्रपति रासीपुरम कृष्णस्वामी अय्यर नारायणस्वामी (आर. के. नारायण) द्वारा इस विधेयक पर हस्ताक्षर किए गए
  • 9 नवम्बर 2000 को भारत को 27वें राज्य के रूप में उत्तरांचल राज्य का गठन हुआ
  • 1 जनवरी 2007 को राज्य का उत्तरांचल से परिवर्तित कर उत्तराखंड किया गया

9 नवंबर 2000 को देश के 27वें राज्य के रूप में अस्तित्व में आए उत्तराखंड राज्य का गठन बहुत लंबे संघर्ष और बलिदानों के फलस्वरूप हुआ। क्षेत्रीय जनता ने अंग्रेजों को 1815 में सिगौली की संधि के साथ इसी शर्त के साथ अपनी जमीन पर पांव रखने दिये थे कि वह उनके परंपरागत कानूनों के साथ उन्हें अलग इकाई के रूप में रखेंगे। ब्रिटिश कुमाऊं के पहले कमिश्नर बने ई गार्डनर के बीच 27 अप्रैल 1815 को हुई सिगौली की संधि में इस भूभाग को अलग प्रशासनिक अधिकार दिये जाने की शर्त रखी गई थी, जिसे अलग पटवारी व्यवस्था जैसे कुछ प्रावधानों के साथ कुछ हद तक मानते हुए अंग्रेजी दौर से ही प्रशासनिक व्यवस्था उनके हक-हकूकों पर पाबंदी लगाती रही। इसी कारण कभी यहां विश्व को वनों के संरक्षण का संदेश देने वाला ‘मैती आंदोलन’ तो कभी देश को नया वन अधिनियम देने वाला ‘वनांदोलन’ लड़ा गया। सितम्बर 1916 में, बाद में स्वतंत्र भारत के दूसरे गृह मंत्री बने गोविन्द बल्लभ पंत, ‘कुमाऊं केसरी’ बद्रीदत्त पांडे, हरगोविंद पंत, इंद्र लाल साह, मोहन सिंह दड़मवाल, चन्द्र लाल साह, प्रेम बल्लभ पांडे, भोला दत्त पांडे व लक्ष्मीदत्त शास्त्री आदि के द्वारा ‘कुमाऊं परिषद्’ की स्थापना की गई, जो कि 1926 में स्थानीय मुद्दों को राष्ट्रीय स्तर पर उठाने के लिए कांग्रेस में समाहित हो गई। 27 नवम्बर 1923 को संयुक्त प्रांत के गवर्नर को ज्ञापन देकर पूर्व की तरह अलग इकाई बनाए रखने की मांग की। आगे वर्ष 1940 में कांग्रेस के हल्द्वानी सम्मेलन में बद्री दत्त पांडे ने पर्वतीय क्षेत्र को विशेष दर्जा तथा अनुसूया प्रसाद बहुगुणा ने कुमाऊं-गढ़वाल को पृथक इकाई के रूप में गठन करने की मांगें रखीं। 1952 में सीपीआई नेता कामरेड पीसी जोशी ने अलग राज्य की मांग उठाई। 1954 में विधान परिषद के सदस्य इंद्र सिंह नयाल (वर्तमान कुमाऊं आयुक्त अवनेंद्र सिंह नयाल के पिता) ने यूपी के मुख्यमंत्री बने गोविंद बल्लभ पंत के समक्ष विधान परिषद में पर्वतीय क्षेत्र के लिए पृथक विकास योजना बनाने का प्रस्ताव रखा, जिसके फलस्वरूप 1955 में फजल अली आयोग ने पर्वतीय क्षेत्र को अलग राज्य के रूप में गठित करने की संस्तुति की। वर्ष 1973 से यूपी में उत्तराखंडवासियों को कुछ दिलासा देने को पर्वतीय विकास विभाग का गठन कर दिया गया, लेकिन बात नहीं बनी। 24 जुलाई 1979 को पृथक राज्य के गठन के लिए मसूरी में अंतरराष्ट्रीय स्तर के भौतिकी वैज्ञानिक एवं गांधीवादी विचारक कुमाऊं विवि के कुलपति डा. डीडी पंत की अगुवाई में हुई बुद्धिजीवियों की बैठक में उत्तराखंड क्रांति दल नाम से राजनीतिक दल का गठन किया गया। नवम्बर 1987 में पृथक राज्य के गठन के लिए नई दिल्ली में प्रदर्शन हुआ और राष्ट्रपति को ज्ञापन भेजकर हरिद्वार को भी प्रस्तावित राज्य में सम्मिलित करने की मांग की गई। आगे 1994 में यूपी में अन्य पिछड़ी जातियों को 27 फीसद आरक्षण देने के विरोध में सुलगे आरक्षण आंदोलन की चिनगारी राज्य आंदोलन की मशाल बन उठी। इस आंदोलन के छह वर्ष बाद उत्तराखंड राज्य का गठन किया गया।

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