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Wednesday, April 21, 2021
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उत्तराखंड के कुमाऊँ का होली त्यौहार होता है बेहद खास, आइये जाने इसके बारे में

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पूरे देश में हर्षोल्लास से होली का त्यौहार मनाया जाता है। कुमाऊँ की होली भी अपने आप में बेहद खास होती है। उत्तराखंड राज्य के कुमाऊँ क्षेत्र में होली का त्यौहार एक अलग तरह से मनाया जाता है, जिसे कुमाऊँनी होली कहते हैं। कुमाऊँनी होली का अपना ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्त्व है। यह कुमाऊँनी लोगों के लिए सबसे महत्वपूर्ण त्यौहारों में से एक है, क्योंकि यह केवल बुराई पर अच्छाई की जीत का ही नहीं, बल्कि पहाड़ी सर्दियों के अंत का और नए बुआई के मौसम की शुरुआत का भी प्रतीक है, जो इस उत्तर भारतीय कृषि समुदाय के लिए बहुत महत्व रखता है।
कुमाऊं में होली की शुरुआत 2 महीने पहले हो जाती है। अबीर-गुलाल के साथ ही होली  गायन की विशेष परंपरा है। यहां की होली पूरी तरह से हिन्दुस्तानी शास्त्रीय अंदाज में गाई  जाती है। होली गायन गणेश पूजन से शुरू होकर पशुपतिनाथ शिव की आराधना के साथ  साथ ब्रज के राधाकृष्ण की हंसी-ठिठोली से सराबोर होता है। अंत में आशीष वचनों के साथ  होली गायन खत्म होता है।
कुमाऊं में होली दो तरह की होती है- खड़ी होली और बैठकी होली। बैठकी होली के गायन  से होली की शुरुआत होती है। बैठकी होली घरों और मंदिरों में गाई जाती है। मान्यता है  कि यहां वसंत पंचमी से होली शुरू हो जाती है लेकिन कुमाऊं के कुछ हिस्सों में पौष माह  के पहले रविवार से होली की शुरुआत होती है। उस समय सर्दी का मौसम अपने चरम पर  होता है। सर्द दुरूह रातों को काटने के लिए सुरीली महफिलें जमने लगती हैं। हारमोनियम व  तबले की थाप पर राग-रागिनियों का दौर शुरू हो जाता है। बैठकी होली में महिलाओं की महफिल अलग जमती है, तो पुरुषों की अलग। महिलाओं की  होली में लोकगीतों का अधिक महत्व होता है। इसमें नृत्य-संगीत के अलावा हंसी-ठिठौली  अधिक होती है। पुरुषों की बैठकी होली का अपना महत्व है। इसमें फूहड़पन नहीं होता है।  हारमोनियम, तबले व चिमटे के साथ पुरुष टोलियों में गाते नजर आते हैं। ठेठ शास्त्रीय  परंपरा में होली गाई जाती है।

कुमाऊँनी होली की उत्पत्ति:

कुमाऊँनी होली की उत्पत्ति, विशेष रूप से बैठकी होली की संगीत परंपरा की शुरुआत तो 14वीं शताब्दी में चम्पावत के चन्द राजाओं के महल में, और इसके आस-पास स्थित काली-कुमाऊँ, सुई और गुमदेश क्षेत्रों में मानी जाती है। बाद में चन्द राजवंश के प्रसार के साथ ही यह सम्पूर्ण कुमाऊँ क्षेत्र तक फैली। सांस्कृतिक नगरी अल्मोड़ा में तो इस त्यौहार पर होली गाने के लिए दूर दूर से गायक आते थे।

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