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Friday, January 22, 2021
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उत्तराखंड में इस गुफा में छिपा है कलयुग के अंत का राज जानिए

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जिस तरह से सतयुग, द्वापर और त्रेतायुग  का अंत हुआ है ठीक उसी प्रकार कलियुग का अंत भी निश्चित है। स्कंद पुराण के अनुसार उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल में गंगोलीहाट कस्बे में स्थित इस पाताल भुवनेश्वर गुफा के विषय में कहा गया है कि इसमें भगवान शिव का निवास है। सभी देवी-देवता इस गुफा में आकर भगवान शिव की पूजा करते हैं और अपनी मनोकामना की पूर्ति करते हैं। यह गुफा पहाड़ी के करीब 90 फीट अंदर है। पाताल भुवनेश्वर गुनऊर किसी अजूबे से कम नहीं है ।
भारत के इतिहास में कई पौराणिक मंदिरों का उल्लेख मिलता है। धर्म के लिहाज से भी यह मंदिर बहुत ही मान्यता रखते हैं। इन्हीं मंदिरों में से एक है पाताल भुवनेश्वरी की गुफा स्थित मंदिर। हमारे पुराणों की मानें तो पाताल भुवनेश्वर के अलावा कोई ऐसा स्थान नहीं है, जहां एकसाथ चारों धाम के दर्शन होते हों। इस पवित्र और रहस्यमयी गुफा में कई सदियों का इतिहास मिलता है। मान्यता है कि यह एक ऐसी इकलौती गुफा है जहां हिंदू धर्म के 33 करोड़ देवी-देवता एकसाथ निवास करते हैं। पाताल भुवनेश्वर उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल के शहर अल्मोड़ा से शेराघाट होते हुए 160 किलोमीटर की दूरी तय कर पहाड़ियों के बीच बने कस्बे गंगोलीहाट में स्थित है। पाताल भुवनेश्वर में देवदार के घने जंगलों के बीच कई सारी गुफाएं हैं। इन्हीं में से एक बड़ी गुफा में शंकर जी का मंदिर भी है। पाताल भुवनेश्वर की मान्यताओं के मुताबिक, इसकी खोज आदि जगत गुरु शंकराचार्य ने की थी।

जाने कैसी है पाताल भुवनेश्वर गुफा-

गुफा के संकरे रास्ते से जमीन के अंदर आठ से दस फीट अंदर जाने पर गुफा की दीवारों पर शेषनाग सहित विभिन्न देवी-देवताओं की आकृति नजऱ आती है। गुफा की शुरुआत में शेषनाग के फनों की तरह उभरी संरचना पत्थरों पर नजऱ आती है। मान्यता है कि धरती इसी पर टिकी है। इस गुफा में चार खंभा है जो चार युगों अर्थात सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग तथा कलियुग को दर्शाते हैं। इनमें पहले तीन आकारों में कोई परिवर्तन नहीं होता। जबकि कलियुग का खंभा लम्बाई में अधिक है और उस खंबे के ऊपर छत से एक पिंड नीचे लटक रहा है। जिसके बीच की दूरी महज बहुत कम बची है। 7 करोड़ वर्षों में यह पिंड 1 ईंच बढ़ता है। और इसके बारे में मान्यता है कि जिस दिन यह पिंड कलियुग के खंभे से मिल जाएगा उस दिन महाप्रलय आ जाएगा और कलियुग समाप्त हो जायेगा।

जाने पाताल भुवनेश्वर गुफा का महत्व-

इस गुफा को त्रेता युग में राजा ऋतुपर्ण ने सबसे पहले देखा। द्वापर युग में पाण्डवों ने यहां चौपड़ खेला और कलयुग में जगदगुरु शकराचार्य का 833 ई के आसपास इस गुफा से साक्षात्कार हुआ तो उन्होंने यहां तांबे का एक शिवलिंग स्थापित किया। इसके बाद चन्द राजाओं ने इस गुफा के विषय मे जाना और आज यहां देश-विदेश से सैलानी आते हैं जहां पर चारों धामों के दर्शन एक साथ होते हैं। शिवजी की जटाओं से बहती गंगा की धारा यहां नजर आती है तो अमृतकुंड के दर्शन भी यहां पर होते हैं। ऐरावत हाथी भी आपको यहां दिखाई देगा और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार स्वर्ग का मार्ग भी यहां से शुरू होता है।
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