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Tuesday, October 27, 2020
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एक दिन पहले नीमा फोन पर कहा था चुशूल में मेरी जान को खतरा है माँ, मेरे लिए पूजा करना और रात 3 बजे फौजी उनकी शहादत की खबर लाए

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लेह का चोगलमसार घर है उन तमाम रिफ्यूजियों का जो किसी वक्त तिब्बत से भारत आए थे। रिफ्यूजी कैम्प नंबर एक में रहता था नीमा तेनजिन का परिवार। जिनके हिस्से ऐसी शहादत आई जो इन तमाम रिफ्यूजियों का गर्व बन गई। पहली बार स्पेशल फोर्स, टूटू रेजिमेंट या विकास रेजिमेंट कहलाने वाली भारतीय सेना की इस खास हिस्से की शहादत को यूं आम लोगों के बीच पहचान मिली है।

नेशनल हाईवे से जो रास्ता चुशूल को जाता है, लेह एयरपोर्ट से उसी रास्ते पर बस 3 किमी की दूरी पर है नीमा तेनजिन का घर। छोटी गलियों से होकर जब एक मोड़ पर हम उनके घर का रास्ता पूछने रुके तो वहां गली के मुहाने पर बैठीं दो महिलाओं के मुंह पर बस मुस्कुराहट थी। और आंखों में गर्व।

शहीद नीमा तेनजिन का घर। कुछ दिन पहले लद्दाख में एलएसी के पास माइन ब्लास्ट में तेनजिन शहीद हो गए।
शहीद नीमा तेनजिन का घर। कुछ दिन पहले लद्दाख में एलएसी के पास माइन ब्लास्ट में तेनजिन शहीद हो गए।

 

घर पर सफेद टेंट लगा है। आने-जाने वाले लोग भी बहुत हैं। रिश्तेदार, पड़ोसी वहां एक खास पूजा कर रहे हैं। एक कमरे में नीमा की तस्वीर रखी है, सामने एक बौद्ध मठ में दीया जल रहा है। दीये की लौ उस तस्वीर की फ्रेम को बार-बार छूने की कोशिश कर रही है, जिसमें एक शहीद का चेहरा चमक रहा है। सामने कुछ फल और एक पूजा के बर्तन में पानी रखा था। एक दूसरे कमरे में तीन महिलाएं बैठकर दीपक के लिए बत्तियां बना रही थीं। कुछ मंत्र गुनगुना रही थीं। उनके सामने अनगिनत छोटे-छोटे दीये जल रहे थे। बेखौफ से ऐसे ही दीये एक तीसरे कमरे में भी जल रहे थे, जिसके सामने बैठे कुछ बुजुर्ग और कुछ बौद्ध भिक्षु मंत्र पढ़ रहे थे।

इसी तीसरे कमरे में नीमा की मां भी बैठी थीं। हाथ में प्रेयर व्हील लिए। वो उसे घुमाती हैं और फिर मंत्र बोलने लगती हैं। वहां पूजा में खलल न पड़े तो हम वहां मौजूद रिश्तेदारों से बात करने उस कमरे में लौट आए जहां नीमा तेनजिन का शव रखा था और अब उसकी जगह उनकी फोटो। उनका सबसे छोटा बेटा उसी दिन से चुप है।

बात करने की कोशिश की तो बोला, ‘सब कितने दुखी हैं, कुछ पूछूंगा तो रोने लगेंगे।’ फिर कहने लगा, ‘उस दिन रात को तीन बजे पड़ोसियों ने हमें दरवाजा खटखटाकर उठाया। कहने लगे फौजी लोग आए हैं। वो बोल रहे हैं तुम्हारे पिता की मौत हो गई है। हमें भरोसा ही नहीं हुआ। एक दिन पहले ही पापा ने फोन किया था। वो बोल रहे थे मेरी जिंदगी को खतरा है। तुम लोग मेरे लिए पूजा करना।’

नीमा दो साल बाद रिटायर होने वाले थे। पिछले एक साल से वे घर नहीं आए थे।
नीमा दो साल बाद रिटायर होने वाले थे। पिछले एक साल से वे घर नहीं आए थे।

तेनजिन का भाई भी उसी फोर्स का हिस्सा है, जिसके लिए पिता ने शहादत दी। कुछ दिन पहले ही वो देहरादून के पास चकराता आर्मी कैम्प से लद्दाख आया है। पोस्टिंग हुई थी उनकी चीन बॉर्डर पर। चाचा का बेटा भी उनकी यूनिट में है। उसी टूटू रेजिमेंट में। रिफ्यूजियों की इस कॉलोनी के हर घर से कम से कम 2 लोग फौज में हैं।

नीमा के भाई पास ही के कैम्प से आए हैं, कहते हैं ‘2 साल बाद भाई को रिटायर होना था। पिछले एक साल से वो घर नहीं आ पाए थे। छुट्‌टी ही नहीं मिली थी।’ आखिर क्या वजह होगी कि इस कॉलोनी के तमाम तिब्बती उस रेजिमेंट का हिस्सा बनना चाहते हैं, जिसकी पहचान छिपाना जरूरी है? इस सवाल पर वो कहने लगे, ‘हम लोग दो देशों के हैं। तिब्बत और भारत। मेरा भाई नीमा कहता था वो चीन के खिलाफ लड़ना चाहता है ताकि तिब्बत आजाद हो जाए और वो अपनी जमीन एक बार देख पाए।’

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